



निश्चय और अटल विश्वास ही सफलता की कुंजी है – ब्रह्माकुमार श्याम भाई l
आबू पर्वत मधुबन से पधारे ब्रह्माकुमार श्याम भाई नें अपने अनुभवों से ब्रह्माकुमारीज़ साधकों को किया लाभान्वितl
विशाल संगठन बेहद मधुबन यज्ञ में रहते हुए 20 वर्ष सफलता पूर्वक व्यतीत करने के गुंड़ रहस्य को किया साझाl
व्यवहार में नम्रता, वाणी में मिठास और चेहरे पर आत्मविश्वास की चमक परिपक्व व्यक्ति की पहचान – शशिप्रभा दीदी
कोटमीसुनार:-ब्रह्माकुमारीज, प्रभु अनुराग भवन,भाटापारा, कोटमिसुनार में ब्रह्माकुमारीज के नियमित साधकों को संबोधित करते हुए आबू पर्वत मधुबन ज्ञान सरोवर से पधारे ब्रह्माकुमार श्याम भाई ने कहा की निश्चय और अटल विश्वास ही सफलता की कुंजी है, एक परमात्मा में अटूट निश्चय अटल विश्वास और स्वयं के ऊपर अटेंशन, अपने कर्मों के ऊपर समर्पणता के द्वारा हम बड़ी आसानी से अपनी मंजिल को प्राप्त कर लेते हैं lउन्होंने कहा कि इसी तरह मेरे जीवन का भी कुछ अनुभव रहा है विशाल संगठन बेहद मधुबन यज्ञ में रहते हुए 20 वर्ष सफलता पूर्वक व्यतीत करने के गुंड़ रहस्य को साझा करते हुए श्याम भाई ने बताया कि परमात्मा बहुत कुछ देते हैं परंतु कुछ परीक्षाओं का सामना हमें अपनी हिम्मत और गुणों के आधार पर करना पड़ता है सहनशीलता जिम्मेवारी हिम्मत न हारना इन सभी बातों का मैंने ध्यान रखा और ऐसे करते मुझे आज 20 वर्ष हो चुके हैं इस तरह पुरुषार्थ करते हुए मुझे हर पल आंतरिक उन्नति और बाह्य उन्नति का आभास हो रहा है l ब्रह्माकुमार श्याम भाई ने सभी साधकों को गहन शांति का अनुभव राजयोंग मेडिटेशन के द्वारा कराया l और प्रतिदिन इस साधना को आगे बढ़ाते रहने की प्रेरणा दीl
गीता सार प्रवक्ता ब्रह्माकुमारी शशिप्रभा दीदी ने श्याम भाई का स्वागत पुष्प गुच्छ और तिलक के द्वारा किया और उनके ब्रह्माकुमारीज़ कोटमिसुनार सेवाकेंद्र में प्रथम आगमन पर हर्ष एवं आभार व्यक्त किया l इस अवसर पर रामनाथ सोनी, टीकाराम केव्रतय, भविष्य भारद्वाज, महेंद्र थवाइत, भागवत पटेल, पुष्पा केवट, दिनेश कुंभकार, होरीलाल, अनूप पटेल, संदीप केवट, राजकुमार, रमेश थवाइत आदि उपस्थित रहेl
गीता सार सुखद जीवन का आधार शिविर के तृतीय चरण में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए शशिप्रभा दीदी जी नें मनुष्य आत्मा के कर्तव्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा की”किसी का अच्छा नहीं कर सकते तो किसी का बुरा तो करो ही नहीं। पाप का खाता हमारा ही तैयार होता है”। उन्होंने गलत कर्मों के परिणामों को स्वयं ही भुगतने की बात दोहराई और जीवन में विवेक जागृत रखने की प्रेरणा दी। समस्याओं के समाधान के लिए सही सलाहकार का चुनाव करने को महत्वपूर्ण बताया, जैसे अर्जुन ने श्री कृष्ण को चुना था।
शशिप्रभा दीदी ने श्रीमद् भगवद् गीता के 17वें अध्याय के आधार पर भोजन की शुद्धता पर भी मार्गदर्शन दिया, जिसमें अत्यधिक पका हुआ, बासी, सड़ा हुआ या प्रदूषित भोजन न करने और सात्विक, फल-फलाहार को प्राथमिकता देने की बात कही गई।
उद्बोधन के अंत में, दीदी ने भगवत गीता के 18वें अध्याय “मोक्ष सन्यास योग” के सार को समझाते हुए कहा कि पके हुए फल की तीन पहचान – नरम हो जाना, मीठा हो जाना और रंग बदल जाना – वैसे ही व्यक्ति में नम्रता, वाणी में मिठास और चेहरे पर आत्मविश्वास की चमक आ जाती है। उन्होंने भगवान के वचन को याद दिलाया: “सर्व धर्मानी परित्यज्य मामेकम शरणम व्रज अहम त्वां सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:” – सभी प्रकार के धर्मों का परित्याग करो, केवल मेरी शरण में आ जाओ तो मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूंगा, अर्जुन डरो मत।




