राकेश मिश्रा की रिपोर्ट…….गेवरा//दीपका//कोरबा…..
एसईसीएल (SECL) प्रबंधन की कोयला खदानों और जर्जर सड़कों से उड़ने वाली काली धूल अब क्षेत्र के लिए धीमा जहर साबित हो रही है खदानों से कोयला लेकर निकलने वाले भारी वाहनों ने न केवल कॉलोनियों और गांवों की आबोहवा बिगाड़ दी है बल्कि आलम यह है कि खुद क्षेत्रीय महाप्रबंधक (GM) कार्यालय भी अब इस धूल के गुबार से अछूता नहीं रह गया है ।

*दफ्तरों के भीतर तक पहुंची कालिख*
हैरानी की बात यह है कि जो अधिकारी इस प्रदूषण को रोकने के लिए जिम्मेदार हैं वे खुद धूल भरे कमरों में बैठकर फाइलों पर हस्ताक्षर कर रहे हैं हवा में उड़ती कोयले की महीन डस्ट अब एसईसीएल के दफ्तरों के भीतर तक प्रवेश कर चुकी है कर्मचारी और ग्रामीण रोजाना इस काली डस्ट को अपने फेफड़ों में उतारने को मजबूर हैं लेकिन प्रबंधन गहरी नींद में सोया हुआ है

01. पर्यावरण विभाग:- कागजों पर क्लीन धरातल पर धूलजनसुनवाई के दौरान बड़े-बड़े वादे और पर्यावरण संरक्षण का ढिंढोरा पीटने वाला पर्यावरण विभाग भी अब कठघरे में है ।
02. दिखावे की जनसुनवाई:- ग्रामीणों का आरोप है कि जनसुनवाई के समय प्रदूषण नियंत्रण के बेहतर इंतजामों का झांसा देकर कोयला उत्पादन का वार्षिक लक्ष्य तो बढ़ा लिया जाता है लेकिन धरातल पर धूल दबाने के लिए पानी का छिड़काव तक नहीं होता ।
03. नियमों की धज्जियां:- पर्यावरण विभाग की चुप्पी यह संकेत देती है कि उन्हें जनता के स्वास्थ्य से ज्यादा खदान के टार्गेट की चिंता है प्रबंधन द्वारा नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं ।
*आंखों पर बंधी है काली पट्टी*
प्रभावित ग्रामीणों का कहना है कि सड़क किनारे रहने वाले परिवारों का जीना मुहाल हो गया है घरों के भीतर रखी खाने-पीने की चीजों से लेकर बिस्तर तक पर कोयले की परत जम रही है इतनी गंभीर स्थिति के बावजूद अधिकारी एसी कमरों और बंद गाड़ियों में बैठकर जनता की तकलीफों के प्रति आंखों पर काली पट्टी बांधे हुए हैं ।

*चेतावनी*
क्षेत्र के प्रभावित ग्रामीणों और जागरूक नागरिकों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही सड़कों पर पानी का नियमित छिड़काव कोल वाहनों को तिरपाल से ढंकना और डस्ट कंट्रोल के पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए तो उग्र आंदोलन किया जाएगा जिसकी समस्त जिम्मेदारी एसईसीएल प्रबंधन और प्रशासन की होगी ।


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