मंगलवार का दिन… दोपहर के लगभग 4 बजे, सक्ती ग्राम जामपाली पोस्ट नदौरखुर्द निवासी पिता प्यारेलाल बंजारे माता श्रीमती सोनम बंजारे अपनी पुत्री दो वर्षीय वृतिका बंजारे को उसके परिजन लगभग टूट चुकी उम्मीदों के साथ श्री शिशु भवन हॉस्पिटल लेकर पहुंचे। बच्ची अचेत थी… आंखें बंद, शरीर निस्पंद, और मुंह से झाग निकल रहा था। वह खुद से सांस भी नहीं ले पा रही थी। हर पल ऐसा लग रहा था जैसे जिंदगी उससे दूर होती जा रही हो।


माता-पिता की आंखों में डर था, बेबसी थी… और कहीं न कहीं अपनी बच्ची को खो देने का भय साफ झलक रहा था।
ऐसे नाजुक समय में डॉ. श्रीकांत गिरी और उनकी समर्पित टीम ने बिना एक पल गंवाए मोर्चा संभाला। तुरंत बच्ची को वेंटिलेटर पर लिया गया, श्वास नली में पाइप डालकर उसकी सांसों को थामने की कोशिश शुरू हुई। स्थिति इतनी गंभीर थी कि हर सेकंड किसी परीक्षा से कम नहीं था।
परिजनों को भी यह नहीं पता था कि आखिर हुआ क्या है… लेकिन डॉक्टरों ने हार नहीं मानी। लक्षणों की गहराई से जांच कर उन्होंने अंदाजा लगाया कि यह मामला सर्पदंश का हो सकता है। उसी विश्वास और अनुभव के साथ उपचार शुरू किया गया।
तीन दिन… तीन लंबी रातें… हर पल उम्मीद और चिंता के बीच झूलता रहा। डॉ. श्रीकांत गिरी और उनकी टीम ने दिन-रात एक कर दिए। उनकी मेहनत, लगन और सेवा भावना ने आखिरकार चमत्कार कर दिखाया—


तीसरे दिन… वर्तिका ने धीरे-धीरे अपनी आंखें खोलीं।
वो पल सिर्फ एक मेडिकल सफलता नहीं था… वो एक परिवार के लिए टूटी उम्मीदों का फिर से जिंदा होना था।
इसके बाद बच्ची को वेंटिलेटर से हटाकर ऑक्सीजन सपोर्ट पर लाया गया, और फिर धीरे-धीरे उसने खुद बैठना शुरू कर दिया। हर दिन उसकी मुस्कान लौट रही थी… और उसके साथ उसके माता-पिता की सांसें भी।
आज, वही बच्ची पूरी तरह स्वस्थ होकर अस्पताल से अपने घर लौटी—एक नई जिंदगी के साथ।
बच्ची के माता-पिता भावुक होकर बोले—
“हमने तो अपनी बच्ची को खो दिया था… लेकिन यहां उसे नया जीवन मिला है। ये अस्पताल हमारे लिए भगवान से कम नहीं है…”
यह सिर्फ एक इलाज नहीं… बल्कि मानवता, समर्पण और सेवा का एक जीवंत उदाहरण है।
उक्त जानकारी श्री शिशु भवन हॉस्पिटल के प्रबंधक नवल वर्मा द्वारा दी गई।

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